Monday, July 7, 2014

॥ मैं रहूँ या ना रहूँ ॥

मैं रहूँ या ना रहूँ, मेरा निशां रह जाएगा,
पेड़ पे गर एक भी, पत्ता हरा रह जाएगा ॥

लिख रहा हूँ कुछ नई संवेद्नाए यहाँ,
पढ़ने का एक अजब सा सिलसिला रह जाएगा ॥

अपने शब्दों को न दे सियाशत की जुबां अ बेअदब,
वरना हर एक शब्द काँटा सा गड़ा रह जाएगा ॥

मैं भी लहरों सा मच्लू मगर दरिया मेरी मंज़िल नहीं,
मैं भी दरिया हो गया तो मेरा क्या रह जाएगा ॥

कल यूही फैल जाएगा “महेश” सबऔर खुसबू की तरह,
सबा संग ले जाएगी अपने, जग ढूँढता रह जाएगा ॥ 
                          "महेश मुकदम"

Wednesday, May 7, 2014

॥ गर्दिश के हजारो रंग देखे है मैंने ॥

गर्दिश के ये पल बीत जाने दे,
मुझे थोड़ा इस वक्त को समझाने दे,
सोदा किया है तक़दीर से मैंने,
जरा थोड़ा तक़दीर से बैठ के बतलाने दे ॥

गर्दिश के हजारो रंग देखे है मैंने
यूही शायद बहारों का रंग भूल गया ॥

जब भी देखे खंडर ही देखे है मैंने
इसीलिए बुलंद मीनारों का रंग भूल गया ॥

हवा उड़ा के ले गयी बहुत दूर तलक,
तमाम सफर के बाद कहाँ जाना है भूल गया ॥

खूब रोशनी थी शाकी तेरे मैखाने मे,
फिर भी बनते हुए जाम उठाना भूल गया ॥

वो सितम की राह बनाते चले हर कदम,
मैं उन राहो मे बहाना बनाना भूल गया ॥

लोग अक्सर अपने दामन पे दाग छुपा लेते है,
मैं अपने दामन के दाग छुपाना भूल गया ॥

जब भी पाया खुद को छोटा(तुच्छ) पाया मैंने,
इसीलिए महेश अपना कद(वर्चस्व) बढ़ाना भूल गया ॥




॥ अक्सर दोस्त बदल जाते है ॥

जो मिलते है राहों मे नजरे चुरा के निकल जाते है,
ऐसे मौसम भी नहीं बदलता जैसे दोस्त बादल जाते है ॥

गिरिफ़्तार-ए-यारी मे रहता हूँ हरदम,
लोग कहते है ठोकरे खाने पे संभल जाते है ॥

वो जख्म देके भी न हुआ शर्मिंदा,
शायद हम गलत थे के पत्थर भी पिघल जाते है ॥

भरोषा किया जो उनपर खुद से ज्यादा,
वक़्त-ए-गर्दिश मे वो सबसे पहले बदल जाते है ॥

जब भी तन्हा पाते है खुद को दुनिया मे,
मेरे अरमान कागज-कलम पे उतर/निकल जाते है ॥

बस नफरत है महेश” अपनों के दिलों मे भी अब,
रूह पे है ख़राशें बेहद चल इस दुनिया से निकल जाते है ॥ 

॥ जहां देखा बनावटी पैसगार मिला ॥

जहां देखा बनावटी पैसगार मिला,
हर चहरे पे दूसरा चहरा तैयार मिला ॥

जब भी सच को जानना चाहा,
कोई न कोई झूठ का हकदार मिला ॥

जब भी किया विसवाश खुद से ज्यादा उनपर,
पलट के जो देखा तो रूह पे ख़राशो का अंबार मिला ॥

मैं डरता था अपनेपन से शायद,
इसी लिए शौहरतों मे गैरो का व्यापार मिला ॥

वफा, नेकी, सच्चाई, की बात जब भी करना चाहा,
जहालत ये देखो गफलत मे लोगो का दरबार मिला ॥

कितना था दम मेरे चराग मे ये तब ही पता चला,
जब बिना फ़ानूस के मंजिल मे तूफानो का भंडार मिला ॥

खंजर लिए खड़े थे कई मीत हाथो मे,
अब “महेश” क्या चले दुआए क्या सिकवा गिला  ॥ 

Monday, May 5, 2014

॥ तू "बेनज़ीर" था, तू "बाज-ए-तदबीर" था ॥

तू "बेनज़ीर" था इस समाज की तक़दीर था,      
तू हर एक पंचायत की "बाज-ए-तदबीर" था ॥     

वो आवाज का जादू था के गर्मी थी लहजे की,
वो अंदाज निराला था के चमक थी चहरे की,
मैं किसको करूँ याद किसको भुलाऊँ,
तुम्हें सोचता हु जितना उतना तुम्हें चाहूँ ॥

हर बात तुम्हारी यू औरों से थी जुदा
जैसे फ़लक पे चाँद सितारो से है जुदा,
है दुनिया मे आज भी दिलदार बहुत अच्छे,
आगे तुम्हारे सभी लगते है बच्चे ॥

आज सिर्फ जिस्म के चर्चे है जान नहीं है,
है बहुत कुछ मगर “मुकदम बालूराम” नहीं है ॥

तेरी हुंकार थी हर कदम,
तेरी पुकार थी हर कदम,
तुम थे तो सब समस्याओं का निवारण था,
तुमसे ही सही ज़िंदगी जीने का आचरण था
दूसरों के लिए जीना तुमने सिखाया था,
सबको समेट के सिने से लगाए रहता हूँ,
अब भी तेरे इंतज़ार मे पलके बिछाये रहता हूँ ॥

तुम वेदना संवेना, तुम ज़िंदगी की चेतना,
तुम मान हो, सम्मान हो,
तुम मेरा ज्ञान हो अभिमान हो,
बस यही है मेरी ज़िंदगी की व्यथा,
तुम “महेश” का आत्म सम्मान रहोगे सदा ॥

(बे नज़ीर= अनुपम, अनूठा, जिसके कोई बराबर का न हो)
(बाज़=करने वाला, कर्ता, प्रतिनिधी तदबीर=काम करने या निकालने का कोई ढंग)



Monday, February 3, 2014

॥ मेरा दोस्त ......मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

मान लिखू सम्मान लिखू,
      या भगवान लिखू,
जो भी लिखू अ दोस्त,
      सबसे पहले तुझे अपनी जान लिखू ॥

तुम मेरा विश्वास हो दिल के पास हो,
मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

सबसे पहले तुम्हारा नाम आता है,
शायद पिछले जन्मो का नाता है,
रब ने तुमसे मिलाया है,
      ज़िंदगी जीना सिखाया है,
तुम मेरी हकीकत हो मेरा विश्वाश हो,
मेरा जुनून हो मेरी धड़कन मेरी शांश हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

वो वक़्त मैं कैसे भुला दु,
ऐसे जीना जाने किस-किस को सीखा दु,
तुम्हारी हर आदत दीवाना बनाती है मुझे,
जब भी मायूष होता हु जीना सिखाती है मुझे,
ज़िंदगी खफा है रहे,
      बस अब तुम ही जीने का अंदाज हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

धोके तुमने भी खाये है मैंने भी,
आँसू तुमने भी बहाये है मैंने भी,
बदल देंगे तकदीर को,
      तोड़ देंगे हर कच्ची तस्वीर को,
अब रोना नहीं हमे खुल के जीना है,
ये भी दोस्त एक जीने का आगाज हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

तुमने भी अपनी दोस्ती खूब निभाई है,
मेरी ज़िंदगी मे अपनी कलम चलाई है,
गर्द लिख रहा था हर वक्त मैं,
फिर सुनहरे शब्दो की क्या झड़ी लगाई है,
अब जीस्त के हर पन्ने मे तुम बदहवाश हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

तेरे बिना जीना बेमानी है,
अगर तुम न हो तो ज़िंदगी सिर्फ जलानी है,
तेरे लिए हर वक़्त दिल जलता है,
हर वक्त तुमसे उलझने को दिल करता है,
के बस अब तुम हो तो मैं हूँ,
      वरना ज़िंदगी बर्बाद हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

तुम वो अहसाह हो जो कभी मिटता नहीं,
तुम वो पर्वत हो जो कभी झुकता नहीं,
कोई क्या कीमत बताएगा तुम्हारी,
तुम वो मोती हो जो कभी बिकता नही,
के तुम हर दर्द मे मेरा मुक्क्दर हो
                     मेरे पास हो ॥

मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥

सच्चा दोस्त है मेरा आजमा के देखे कोई,
करे यकीन उसपे पास आके देखे कोई,
ये वो सोना जो रंग बदलता नही कभी,
जितना चाहो आग मे जला के देखे कोई,
बस अब नम है आंखे साँसे है मध्यम,
नम आंखो से लिखते-२ “महेश”
मेरा दोस्त, भाई ” मेरे पास हो ॥  

तुम मेरा विश्वास हो दिल के पास हो,
मैं कुछ भी नहीं तुम सबसे खास हो ॥


Saturday, February 1, 2014

॥ वो यू गए जैसे शब्दो के नाम ॥

वो यू गए जैसे शब्दो के नाम,
आँखों मे छोड़ गए एक शाम,
एक तन्हा भीगी शाम ॥

वफा के सारे लेखापत्र फट गए,
दीवानगी के सारे रंग सूरज की किरणों से छट गए,
धडकनों को अब कैसे मिले आराम ॥

वो यू गए जैसे........

कटीले शूल है अब राहों मे,
के चुभ रहे है हर “गाम” मेरे पाओं मे,
के हो गए हम फिर से बदनाम ॥

वो यू गए जैसे........

हवाओं ने अपना रुख मोड दिया,
हर डगर ने पीछे छोड़ दिया,
गगन भी समेट ले गया आँचल मे अपने शाम ॥

वो यू गए जैसे........

हर रात तेरी याद मे मचलती रही,
शमा हर “बाम” पे जलती रही,
मगर फिर भी “महेश” तू हो गया नाकाम ॥

वो यू गए जैसे शब्दो के नाम,
आँखों मे छोड़ गए एक शाम,
एक तन्हा भीगी शाम ॥

गाम – कदम

बाम – छज्जा 

Friday, January 31, 2014

यार बदल देंगे

तेरी बात,
उसकी क्या औकात,
और अपने हालात,
   यार बदल देंगे ॥

उसकी सुरुवात,
उनकी क्या मुलाक़ात,
और अपने जज़बात,
    यार बदल देंगे ॥

उसका हाथ,
गैरो का साथ,
गिरते हुए दाँत,
    यार बदल देंगे ॥

आधी सी रात,
गिरती बरसात,
जुगनुओ का साथ,
    यार बदल देंगे ॥

सोचने की बात,
कलम है हाथ,
“महेश” लिखने का अंदाज़,

          यार बदल देंगे ॥ 

Tuesday, January 28, 2014

॥ बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

बिन बेटी संसार अधूरा है,
बेटी है तो घर पूरा है॥

बेटी आंखो की ज्योति है,
शक्तिसवरुपा है सपनों की अंतर्ज्योति है,
मेरा खुद का नया रूप है,
मेरे आँगन मे खिली धूप है,
बेटी है तो जीवन मेरा है॥

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

बेटी से घर मे चहचाहट है,
बेटी है तो सच्ची मुस्कुराहट है,
बेटी से घर मे स्मृधी है,
बेटी से घर मे वृद्धि है,
बेटी है तो जीवन खुशियो का डेरा है॥

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

बेटी घर का सम्मान है,
बेटी है तो आदर है मान है,
मेरे दिल का एहसास है बेटी,
मेरी संवेदना मेरा विश्वास है बेटी,
मेरे लिए सबसे खास है,
बेटी नहीं तो चारो तरफ अंधेरा है,
बेटी है तो घर आँगन उजेरा है॥

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

आंखो मे उजियारा समेटे एक भोर है बेटी,
बिखेरती उजियारा चहुऔर है बेटी,
बेटी खिलखिलाए तो पूरा आँगन चहकता है,
रजनीगंधा सी खुसबू सा सारा घर महकता है,
बेटी मेरा गुरूर है, मेरा अहम है,
मेरे जीवन जीने का करम है,
बेटी है तो हर क्षण ठंडी हवा का फेरा है॥

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

भाई का दुलार है बेटी,
माँ का प्यार है बेटी,
पिता का सम्पूर्ण संसार है बेटी,
घर मे है तो हर दिन त्योहार है बेटी,
बेटी है तो हर दिन सवेरा है,
वरना हर तरफ धुआँ है अंधेरा है,

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥

बेटी दुआ है पावन कथा है,
बेटी ज़ीनत है सुभकामना है,
ग्रंथ है बेटी रचना है भगवान है वंदना है,
त्याग है बेटी क्षमा है,
शाहस की गौरव कथा है,
बेटी हर्षित व्यथा है,
अगर बेटी है तो महेश” सबकुछ तेरा है,

बिन बेटी संसार अधूरा है ॥
  

Saturday, January 25, 2014

॥ शब-ए-इश्क़ मे आँसू बहाना छोड़ दिया ॥

शब-ए-इश्क़ मे आँसू बहाना छोड़ दिया,
हमने गैरो से दिल लगाना छोड़ दिया॥

पी गया हर दर्द सी गया सारे जख्म,
के जख्मो पे मरहम लगाना छोड़ दिया॥

लेता नहीं हिसाब अब उनसे मुहब्बत मे,
के अब सब खाता-ए-इश्क़ बनाना छोड़ दिया॥

वो गली जहां जमती थी ख़ुशनुमा महफिले,
उस गली अब हमने जाना छोड़ दिया॥


कभी हमे अहतराम था उनपे दिल्लगी थी बहुत,
के अब उनसे दिल लगाना छोड़ दिया॥

कब तक पीता घुट-घुट के गमों का जहर,
के हमने अब ताबिश-ए-पैमाना छोड़ दिया॥

उस शाम खून उबलता रहा बहुत देर तक,
बस बहुत हुआ,
अब खून रगों मे जमाना छोड़ दिया॥

जो भी रिश्ता मिला नाओनोश मे मिला महेश,
के अब हमने बादा-ए-जाम उठाना छोड़ दिया॥ 

Friday, January 24, 2014

॥ मेरी आँख के उजाले जाने कहाँ गए ॥

मेरी आँख के उजाले जाने कहाँ गए,
थे कुछ मतवाले लोग जाने कहाँ गए ॥

घने अब्र की छाँव मिली बस,
दिन के सूरज के उजाले जाने कहाँ गए ॥

सुख गए मेरी नज़रों के समुंदर,
आब-ए-तल्ख बरसाने वाले जाने कहाँ गए ॥

अजनबी शहर भर को लगे हम,
दिलों से कांटे मगर निकाले कहाँ गए ॥

गम और दर्द से वास्ता रहा दर-बदर,
खुशियो के सिवाले जाने कहाँ गए ॥

जब देखा हमने देखा टूटा आईना,
शब-ए-आईना दिखाने वाले जाने कहाँ गए ॥

अक्सर चुपचाप रहती है सब महफिले,
आवाजाह करने वाले आश्ना जाने कहाँ गए ॥

ये किसने चश्मे-ए-अत्फ़ से देखा “महेश”,
पलट के देख क़ल्ब-ए-ताबिश जाने कहाँ गए ॥